-
गुजर गया एक और दिन!
आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि और नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीयजी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – गुजर गया एक और दिन,रोज की तरह । चुगली औ’ कोरी तारीफ़,बस…
-
जला हुआ न बुझा हुआ
मिरे साथ जुगनू है हम-सफ़र मगर इस शरर की बिसात क्या, ये चराग़ कोई चराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ| बशीर बद्र
-
और वही लॉन भी!
वही शहर है वही रास्ते वही घर है और वही लॉन भी, मगर इस दरीचे से पूछना वो दरख़्त अनार का क्या हुआ| बशीर बद्र