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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 28th Dec 2023

    यही क़तरे जो!

    यही क़तरे जो दम अपना दिखाने पर उतर आते, समुंदर ऐसी मन-मानी तुझे करने नहीं देते|               वसीम बरेलवी

  • 28th Dec 2023

    तो यूँ धरने नहीं देते!

    ये लोग औरों के दुख जीने निकल आए हैं सड़कों पर, अगर अपना ही ग़म होता तो यूँ धरने नहीं देते|               वसीम बरेलवी

  • 28th Dec 2023

    दिल भरने नहीं देते!

    निगाहों के तक़ाज़े चैन से मरने नहीं देते, यहाँ मंज़र ही ऐसे हैं कि दिल भरने नहीं देते|               वसीम बरेलवी

  • 28th Dec 2023

    वो मेरी प्यास को!

    जब उस के जाम में इक बूँद तक नहीं होती, वो मेरी प्यास को फिर भी सँभाल लेता है|             वसीम बरेलवी

  • 28th Dec 2023

    दरिया उछाल लेता है!

    ढले तो होती है कुछ और एहतियात की उम्र, कि बहते बहते ये दरिया उछाल लेता है|             वसीम बरेलवी

  • 28th Dec 2023

    कोई बुराई का पहलू!

    ये कैसा शख़्स है कितनी ही अच्छी बात कहो, कोई बुराई का पहलू निकाल लेता है|               वसीम बरेलवी

  • 28th Dec 2023

    उदासियों में भी!

    उदासियों में भी रस्ते निकाल लेता है, अजीब दिल है गिरूँ तो सँभाल लेता है|             वसीम बरेलवी

  • 28th Dec 2023

    गुजर गया एक और दिन!

    आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि और नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीयजी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – गुजर गया एक और दिन,रोज की तरह । चुगली औ’ कोरी तारीफ़,बस…

  • 27th Dec 2023

    जला हुआ न बुझा हुआ

    मिरे साथ जुगनू है हम-सफ़र मगर इस शरर की बिसात क्या, ये चराग़ कोई चराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ|                   बशीर बद्र  

  • 27th Dec 2023

    और वही लॉन भी!

    वही शहर है वही रास्ते वही घर है और वही लॉन भी, मगर इस दरीचे से पूछना वो दरख़्त अनार का क्या हुआ|                   बशीर बद्र

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