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ख़्वाब बोना है अभी!
रात इतनी जा चुकी है और सोना है अभी, इस नगर में इक ख़ुशी का ख़्वाब बोना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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घटता-बढ़ता देखते हैं!
तुझको तो हर शाम फ़लक पर घटता-बढ़ता देखते हैं, उसको देख के ईद करेंगे अपना और इस्लाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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तू भी तमाम है चाँद!
अपने दिल के मश्रिक-ओ-मग़रिब उस के रुख़ से मुनव्वर हैं, बे-शक तेरा रूप भी कामिल बे-शक तू भी तमाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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तुझसे काम है चाँद!
हम इस लम्बे-चौड़े घर में शब को तन्हा होते हैं, देख किसी दिन आ मिल हम से हमको तुझ से काम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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भीगी शाम है चाँद!
हम से भी दो बातें कर ले कैसी भीगी शाम है चाँद, सब कुछ सुन ले आप न बोले तेरा ख़ूब निज़ाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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रजनीगन्धा खिले पराए आँगन में!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| किशन सरोज जी ने अपने गीतों में प्रेम के सुकोमल भावों को बड़ी महारत के साथ अभिव्यक्त किया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज का यह गीत– मन की सीमा के…
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बदनाम है चाँद!
वो जो तेरा दाग़ ग़ुलामी माथे पर लिए फिरता है, उसका नाम तो ‘इंशा’ ठहरा नाहक़ को बदनाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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कहाँ कलाम है चाँद!
सखियों से कब सखियाँ अपने जी के भेद छुपाती हैं, हम से नहीं तो उस से कह दे करता कहाँ कलाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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तू भी हरे दरीचे वाली!
तू भी हरे दरीचे वाली आ जा बर-सर-ए-बाम है चाँद, हर कोई जग में ख़ुद सा ढूँडे तुझ बिन बसे आराम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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वहशत का पैग़ाम है!
ऐ दिल वालो घर से निकलो देता दावत-ए-आम है चाँद, शहरों शहरों क़रियों क़रियों वहशत का पैग़ाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा