Category: Uncategorized
-
हादिसा कब ये हुआ!
एक वा‘दा था जो शीशे की तरह टूट गया, हादिसा कब ये हुआ कैसे हुआ याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
-
फिर ख़यालों में वो!
फिर ख़यालों में वो बीते हुए सावन आए, लेकिन अब तुझ को पपीहे की सदा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
-
झर पड़ता जीवन-डाली से!
आज मैं छायावाद काल के एक प्रमुख स्तंभ, प्रकृति के चितेरे कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| पंत जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – झर पड़ता जीवन-डाली सेमैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात!–केवल, केवल जग-कानन…
-
राह-नुमा याद नहीं!
रास्ते याद नहीं राह-नुमा याद नहीं, अब मुझे कुछ तिरी गलियों के सिवा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
-
बने हैं दाएरे क्या क्या!
‘क़तील’ ज़ख़्म सहूँ और मुस्कुराता रहूँ, बने हैं दाएरे क्या क्या मिरे अमल के लिए| क़तील शिफ़ाई
-
हज़ार झोंपड़े गिरते हैं!
सदा जिए ये मिरा शहर-ए-बे-मिसाल जहाँ, हज़ार झोंपड़े गिरते हैं इक महल के लिए| क़तील शिफ़ाई
-
हर इक दिमाग़ भला!
किसी किसी के नसीबों में इश्क़ लिक्खा है, हर इक दिमाग़ भला कब है इस ख़लल के लिए| क़तील शिफ़ाई
-
कहाँ से ढूँढ के लाऊँ!
कहाँ से ढूँढ के लाऊँ चराग़ सा वो बदन, तरस गई हैं निगाहें कँवल कँवल के लिए| क़तील शिफ़ाई
-
तिरा वजूद है लाज़िम!
मिरी नज़र से न हो दूर एक पल के लिए, तिरा वजूद है लाज़िम मिरी ग़ज़ल के लिए| क़तील शिफ़ाई
-
तुम मन्द चलो!
आज मैं हिन्दी के प्रमुख कवि जिन्हें साहित्य से जुड़े पुरस्कारों के अलावा पद्म भूषण जैसे उच्च नागरिक सम्मान से भी अलंकृत किया गया था, ऐसे स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चतुर्वेदी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी…