Category: Uncategorized
-
चिट्ठी खोल दी हमने!
तुम्हारे दुख उठाए इसलिए फिरते हैं मुद्दत से, तुम्हारे नाम आई थी जो चिट्ठी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
-
प्रगल्भ प्रेम!
आज मैं छायावाद काल के एक प्रमुख स्तंभ, और हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| निराला जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की यह कविता – आज नहीं है मुझे और कुछ…
-
पट्टी खोल दी हमने!
पुराने हो चले थे ज़ख़्म सारे आरज़ूओं के, कहो चारागरों से आज पट्टी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
-
खिड़की खोल दी हमने
तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्ता, तुम्हारी याद आई और खिड़की खोल दी हमने| मुनव्वर राना
-
गठरी खोल दी हमने!
फ़रिश्तो तुम कहाँ तक नामा-ए-आमाल देखोगे, चलो ये नेकियाँ गिन लो कि गठरी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
-
रस्सी खोल दी हमने!
कहाँ तक बोझ बैसाखी का सारी ज़िंदगी ढोते, उतरते ही कुएँ में आज रस्सी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
-
जो मुट्ठी खोल दी हमने!
पड़ा रहने दो अपने बोरिए पर हम फ़क़ीरों को, फटी रह जाएँगी आँखें जो मुट्ठी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
-
अब तो हम को भी वो!
हम दिया करते थे अग़्यार को ता‘ना जिनका, अब तो हम को भी वो आदाब-ए-वफ़ा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
-
हादिसा कब ये हुआ!
एक वा‘दा था जो शीशे की तरह टूट गया, हादिसा कब ये हुआ कैसे हुआ याद नहीं| क़तील शिफ़ाई