Category: Uncategorized
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अंदाज़-ए-रिंदाना कहें!
थामें उस बुत की कलाई और कहें इस को जुनूँ, चूम लें मुँह और इसे अंदाज़-ए-रिंदाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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ज़िंदगी को दिल कहें!
यार-ए-नुक्ता-दाँ किधर है फिर चलें उस के हुज़ूर, ज़िंदगी को दिल कहें और दिल को नज़राना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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चाहे दीवाना कहें!
दार पर चढ़ कर लगाएँ नारा-ए-ज़ुल्फ़-ए-सनम, सब हमें बाहोश समझें चाहे दीवाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-2
कल से मैंने अपनी रचनाएं, यहाँ शेयर करना शुरू किया है| इसके लिए मैं केवल इतना कर रहा हूँ कि मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से…
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आसार लिए तूफ़ानों के!
‘मजरूह’ उठी है मौज-ए-सबा आसार लिए तूफ़ानों के, हर क़तरा-ए-शबनम बन जाए इक जू-ए-रवाँ कुछ दूर नहीं| मजरूह सुल्तानपुरी
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राह में लाखों वीराने!
सुनते हैं कि काँटे से गुल तक हैं राह में लाखों वीराने, कहता है मगर ये अज़्म-ए-जुनूँ सहरा से गुलिस्ताँ दूर नहीं| मजरूह सुल्तानपुरी
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मेरे नशे में चूर नहीं!
वो कौन सी सुब्हें हैं जिन में बेदार नहीं अफ़्सूँ तेरा, वो कौन सी काली रातें हैं जो मेरे नशे में चूर नहीं| मजरूह सुल्तानपुरी
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ख़याली हूर नहीं!
जन्नत ब-निगह तसनीम ब-लब अंदाज़ उस के ऐ शैख़ न पूछ, मैं जिस से मोहब्बत करता हूँ इंसाँ है ख़याली हूर नहीं| मजरूह सुल्तानपुरी
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बज़्म का ये दस्तूर नहीं
महफ़िल-ए-अहल-ए-दिल है यहाँ हम सब मय-कश हम सब साक़ी, तफ़रीक़ करें इंसानों में इस बज़्म का ये दस्तूर नहीं| मजरूह सुल्तानपुरी