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सवेरा नहीं होता!
क्यूँ मेरा मुक़द्दर है उजालों की सियाही, क्यूँ रात के ढलने पे सवेरा नहीं होता| शहरयार
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तन्हा नहीं होता!
ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता, मैं तुझ से जुदा हो के भी तन्हा नहीं होता| शहरयार
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बिछड़ना है तो बिछड़
बिछड़ना है तो बिछड़ जा इसी दो-राहे पर, कि मोड़ आगे सफ़र में कहीं नहीं आता| शहरयार
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खुले हुए हैं सभी दर!
ये मेरा दिल है कि मंज़र उजाड़ बस्ती का, खुले हुए हैं सभी दर मकीं नहीं आता| शहरयार
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यक़ीं नहीं आता!
जो होने वाला है अब उसकी फ़िक्र क्या कीजे, जो हो चुका है उसी पर यक़ीं नहीं आता| शहरयार
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हमने जो भोगा सो गाया!
आज एक बार फिर मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले विख्यात गीतकार स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत – हमने…
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नज़र जो कोई भी!
नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता, किसी को क्या मुझे ख़ुद भी यक़ीं नहीं आता| शहरयार
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उसी ने रचा है!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात साहित्यकार और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता – नहीं-वह नहीं जो कुछ…