-
गीतों से पहले!
आज मैं हिन्दी के एक विख्यात नवगीतकार श्री रवींद्र भ्रमर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भ्रमर जी की अधिक रचनाएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रवींद्र भ्रमर जी का यह गीत – पँछी में गाने का गुन हैदो तिनके चुनकरवह तृप्त जहाँ होता हैगीतों की…
-
काग़ज़ बिखर रहे हैं!
किस तरह जम्अ‘ कीजिए अब अपने आपको, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के| आदिल मंसूरी
-
चमकते सराब के!
बस तिश्नगी की आँख से देखा करो उन्हें, दरिया रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब* के| *रेगिस्तान में जल का आभास (मृग जल) आदिल मंसूरी
-
जाले थे ख़्वाब के!
सोए तो दिल में एक जहाँ जागने लगा, जागे तो अपनी आँख में जाले थे ख़्वाब के| आदिल मंसूरी
-
उसी ख़ाना-ख़राब के!
वो जो तुम्हारे हाथ से आकर निकल गया, हम भी क़तील* हैं उसी ख़ाना-ख़राब के| *Victim of Love, Killed by आदिल मंसूरी
-
आशिक़ थे शहर में जो!
आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के, हैं उनके दिल में वसवसे अब एहतिसाब* के| *नशाबंदी आदिल मंसूरी
-
एक अंतर्कथा, भाग-1
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात प्रगतिशील कवि स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक लंबी कविता का प्रारंभिक भाग शेयर कर रहा हूँ| मुक्तिबोध जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता – अग्नि के काष्ठखोजती माँ,बीनती नित्य…
-
शाख़ फल तो सकती है
हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवार, यूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी