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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Nov 2023

    बस तरसते ही चले!

    दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम, बस तरसते ही चले अफ़्सोस पैमाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 9th Nov 2023

    गीतों से पहले!

    आज मैं हिन्दी के एक विख्यात नवगीतकार श्री रवींद्र भ्रमर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भ्रमर जी की अधिक रचनाएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रवींद्र भ्रमर जी का यह गीत – पँछी में गाने का गुन हैदो तिनके चुनकरवह तृप्त जहाँ होता हैगीतों की…

  • 8th Nov 2023

    काग़ज़ बिखर रहे हैं!

    किस तरह जम्अ‘ कीजिए अब अपने आपको, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के| आदिल मंसूरी

  • 8th Nov 2023

    चमकते सराब के!

    बस तिश्नगी की आँख से देखा करो उन्हें, दरिया रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब* के| *रेगिस्तान में जल का आभास (मृग जल) आदिल मंसूरी

  • 8th Nov 2023

    जाले थे ख़्वाब के!

    सोए तो दिल में एक जहाँ जागने लगा, जागे तो अपनी आँख में जाले थे ख़्वाब के| आदिल मंसूरी

  • 8th Nov 2023

    उस गुल-बदन पे!

    फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया, उस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के| आदिल मंसूरी

  • 8th Nov 2023

    उसी ख़ाना-ख़राब के!

    वो जो तुम्हारे हाथ से आकर निकल गया, हम भी क़तील* हैं उसी ख़ाना-ख़राब के| *Victim of Love, Killed by आदिल मंसूरी

  • 8th Nov 2023

    आशिक़ थे शहर में जो!

    आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के, हैं उनके दिल में वसवसे अब एहतिसाब* के| *नशाबंदी आदिल मंसूरी

  • 8th Nov 2023

    एक अंतर्कथा, भाग-1

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात प्रगतिशील कवि स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक लंबी कविता का प्रारंभिक भाग शेयर कर रहा हूँ| मुक्तिबोध जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता – अग्नि के काष्ठखोजती माँ,बीनती नित्य…

  • 7th Nov 2023

    शाख़ फल तो सकती है

    हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवार, यूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

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