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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Nov 2023

    पिघल तो सकती है!

    सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के, कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 7th Nov 2023

    कि गिरते गिरते भी!

    तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और, कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 7th Nov 2023

    गल तो सकती है!

    ग़म-ए-ज़माना-ओ-सोज़-ए-निहाँ की आँच तो दे, अगर न टूटे ये ज़ंजीर गल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 7th Nov 2023

    अज़ल से सोई है!

    अज़ल से सोई है तक़दीर-ए-इश्क़ मौत की नींद, अगर जगाइए करवट बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 7th Nov 2023

    बात बिरानी हो जाती है!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – मेरे मन की साध आंख में झांक आंक लोकह देने पर बात…

  • 6th Nov 2023

    धूप ढल तो सकती है!

    कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के, मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Nov 2023

    मचल तो सकती है!

    बुझे हुए नहीं इतने बुझे हुए दिल भी, फ़सुर्दगी में तबीअ‘त मचल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Nov 2023

    उछल तो सकती है

    पलट पड़े न कहीं उस निगाह का जादू, कि डूब कर ये छुरी कुछ उछल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Nov 2023

    चुप सी लग गई वर्ना!

    तिरे ख़याल को कुछ चुप सी लग गई वर्ना, कहानियों से शब-ए-ग़म बहल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Nov 2023

    रौशनी मुझ मिल जाए!

    अजब नहीं कि वही रौशनी मुझ मिल जाए, मैं अपने घर से किसी दिन निकल के देखूँगा|     राहत इंदौरी

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