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पिघल तो सकती है!
सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के, कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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कि गिरते गिरते भी!
तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और, कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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गल तो सकती है!
ग़म-ए-ज़माना-ओ-सोज़-ए-निहाँ की आँच तो दे, अगर न टूटे ये ज़ंजीर गल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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अज़ल से सोई है!
अज़ल से सोई है तक़दीर-ए-इश्क़ मौत की नींद, अगर जगाइए करवट बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बात बिरानी हो जाती है!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – मेरे मन की साध आंख में झांक आंक लोकह देने पर बात…
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धूप ढल तो सकती है!
कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के, मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मचल तो सकती है!
बुझे हुए नहीं इतने बुझे हुए दिल भी, फ़सुर्दगी में तबीअ‘त मचल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उछल तो सकती है
पलट पड़े न कहीं उस निगाह का जादू, कि डूब कर ये छुरी कुछ उछल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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रौशनी मुझ मिल जाए!
अजब नहीं कि वही रौशनी मुझ मिल जाए, मैं अपने घर से किसी दिन निकल के देखूँगा| राहत इंदौरी