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ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी!
तुम्हारे नाम पर मैंने हर आफ़त सर पे रक्खी थी, नज़र शो‘लों पे रक्खी थी ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी
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गाढ़े अंधेरे में!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात आधुनिक कवि कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – इस गाढ़े अंधेरे मेंयों तो हाथ को हाथ नहीं सूझतालेकिन…
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‘ग़ालिब’ को भूल!
कम्पयूटरों से ग़ज़लें लिखेंगे ‘बशीर-बद्र’, ‘ग़ालिब’ को भूल जाएगी इक्कीसवीं सदी| बशीर बद्र
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फिर से ख़ुदा बनाएगा!
फिर से ख़ुदा बनाएगा कोई नया जहाँ, दुनिया को यूँ मिटाएगी इक्कीसवीं सदी| बशीर बद्र
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उन झुग्गियों में आएगी!
जल कर जो राख हो गईं दंगों में इस बरस, उन झुग्गियों में आएगी इक्कीसवीं सदी| बशीर बद्र
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इक्कीसवीं सदी!
आहन* में ढलती जाएगी इक्कीसवीं सदी, फिर भी ग़ज़ल सुनाएगी इक्कीसवीं सदी| *फौलाद बशीर बद्र
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बढ़ता हुआ बच्चा!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज की कविता का विषय भी अलग किस्म का है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की…