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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th May 2024

    कश्तियाँ बदलने का!

    कहीं न सब को समुंदर बहा के ले जाए, ये खेल ख़त्म करो कश्तियाँ बदलने का| शहरयार

  • 24th May 2024

    परछाइयों के चलने का

    यहाँ से गुज़रे हैं गुज़़रेंगे हम से अहल-ए-वफ़ा, ये रास्ता नहीं परछाइयों के चलने का| शहरयार

  • 24th May 2024

    यही तो वक़्त है!

    सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का, यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का| शहरयार

  • 24th May 2024

    बहुरूपिया!  

    आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार और कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता – दुनिया दूषती हैहँसती हैउँगलियाँ उठा कहती है …कहकहे कसती है –राम…

  • 23rd May 2024

    फिर सोचें वो बातें!

    बैठ जाएँ साया-ए-दामान-ए-अहमद में ‘मुनीर’, और फिर सोचें वो बातें जिन को होना है अभी| मुनीर नियाज़ी

  • 23rd May 2024

    मिट्टी में सोना है अभी!

    हम ने खिलते देखना है फिर ख़याबान-ए-बहार, शहर के अतराफ़* की मिट्टी में सोना है अभी| *आसपास मुनीर नियाज़ी

  • 23rd May 2024

    दिल से धोना है अभी!

    जो हुआ होना ही था सो हो गया है दोस्तो, दाग़ इस अहद-ए-सितम का दिल से धोना है अभी| मुनीर नियाज़ी

  • 23rd May 2024

    यादों में खोना है अभी!

    ऐसी यादों में घिरे हैं जिन से कुछ हासिल नहीं, और कितना वक़्त उन यादों में खोना है अभी| मुनीर नियाज़ी

  • 23rd May 2024

    इक खिलौना है अभी!

    क्यूँ दिया दिल उस बुत-ए-कमसिन को ऐसे वक़्त में, दिल सी शय जिस के लिए बस इक खिलौना है अभी| मुनीर नियाज़ी

  • 23rd May 2024

    ख़्वाब बोना है अभी!

    रात इतनी जा चुकी है और सोना है अभी, इस नगर में इक ख़ुशी का ख़्वाब बोना है अभी| मुनीर नियाज़ी

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