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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st May 2024

    फूल खिले पैराहन में!

    उस हुस्न के नाम पे याद आए सब मंज़र ‘फ़ैज़’ की नज़्मों के, वही रंग-ए-हिना वही बंद-ए-क़बा वही फूल खिले पैराहन में| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    रात क़याम करो!

    जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो, ‘इंशा’-जी हम पास भी लेकिन रात की रात क़याम करो| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    छपने अख़बार के बीच

    मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे, नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    शहर-ए-निगार!

    ऐ सख़ियो ऐ ख़ुश-नज़रो यक गूना करम ख़ैरात करो, नारा-ज़नाँ कुछ लोग फिरें हैं सुब्ह से शहर-ए-निगार* के बीच| *CityOfBeauty इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    भरी बहार के बीच!

    पीना-पिलाना ऐन गुनह है जी का लगाना ऐन हवस, आप की बातें सब सच्ची हैं लेकिन भरी बहार के बीच| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    देखो कि!  

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य में अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता – रात कोदिन कोअकेले में और मेले में तुमगुनगुनाते…

  • 20th May 2024

    तुम बाज़ार के बीच!

    दिल सी चीज़ के गाहक होंगे दो या एक हज़ार के बीच, ‘इंशा’ जी क्या माल लिए बैठे हो तुम बाज़ार के बीच| इब्न-ए-इंशा

  • 20th May 2024

    गले से लगाऊँ मैं!

    उस जैसा नाम रख के अगर आए मौत भी, हँस कर उसे ‘क़तील’ गले से लगाऊँ मैं|    क़तील शिफ़ाई

  • 20th May 2024

    ज़मीं को सजाऊँ मैं!

    उतरा है बाम से कोई इल्हाम* की तरह, जी चाहता है सारी ज़मीं को सजाऊँ मैं| *आकाशवाणी क़तील शिफ़ाई

  • 20th May 2024

    बदनाम मेरे क़त्ल से!

    बदनाम मेरे क़त्ल से तन्हा तू ही न हो, ला अपनी मोहर भी सर-ए-महज़र लगाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई

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