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ज़ेहन में बहार भी रख!
ये ही लहू है शहादत ये ही लहू पानी, ख़िज़ाँ नसीब सही ज़ेहन में बहार भी रख| निदा फ़ाज़ली
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इंतिज़ार भी रख!
यक़ीन चाँद पे सूरज में ए‘तिबार भी रख, मगर निगाह में थोड़ा सा इंतिज़ार भी रख| निदा फ़ाज़ली
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क्या था वो एक शख़्स!
अब क्या बताएँ कौन था क्या था वो एक शख़्स, गिनती के चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया| निदा फ़ाज़ली
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उठ उठ के मस्जिदों से
उठ उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए, दहशत-गरों के हाथ में इस्लाम रह गया| निदा फ़ाज़ली
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एक नीला आईना बेठोस!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी में कवियों के कवि कहलाने वाले स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| शमशेर जी का बिंब विधान बहुत गहन होता है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह…
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छुटती नहीं है जल्दी से!
ये ज़ख़्म का निशान है जाएगा देर से, छुटती नहीं है जल्दी से मेहंदी लगी हुई| मुनव्वर राना
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छूता नहीं है कोई भी!
साँसों के आने जाने पे चलता है कारोबार, छूता नहीं है कोई भी हाँडी जली हुई| मुनव्वर राना