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हम तो गुज़र जाएँगे!
‘फ़ैज़’ आते हैं रह-ए-इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम, आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कहते रहें मर जाएँगे!
नेमत-ए-ज़ीस्त का ये क़र्ज़ चुकेगा कैसे, लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बाज़ार-ए-सुख़न!
जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ार-ए-सुख़न, हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर* जाएँगे| *हीरे-मोती फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हम तिरी याद से!
किस क़दर होगा यहाँ मेहर-ओ-वफ़ा का मातम, हम तिरी याद से जिस रोज़ उतर जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हम मुसाफ़िर यूँही!
हम मुसाफ़िर यूँही मसरूफ़-ए-सफ़र जाएँगे, बे-निशाँ हो गए जब शहर तो घर जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अबके फिर गुलमोहर!
आज एक बार मैं वरिष्ठ हिन्दी नवगीतकार सुश्री शांति सुमन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री शांति सुमन जी की यह रचना – अबके फिर गुलमोहर दहकेगाछों भर आग से लहकेकिसी संझियाए पहर में प्रतीक्षा-धुली दो आँखेंलाल-उजली मेघ पाखेंइस…
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कौन फिर ऐसे में!
कौन फिर ऐसे में तन्क़ीद* करेगा तुझ पर, सब तिरे जुब्बा-ओ-दस्तार** में खो जाते हैं| *विवेचना, **लंबा चोगा और पगड़ी मुनव्वर राना
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क्या क़यामत है कि!
क्या क़यामत है कि सहराओं के रहने वाले, अपने घर के दर-ओ-दीवार में खो जाते हैं| मुनव्वर राना
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अख़बार में खो जाते हैं!
ढूँढने रोज़ निकलते हैं मसाइल हमको, रोज़ हम सुर्ख़ी-ए-अख़बार में खो जाते हैं| मुनव्वर राना
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दरबार में खो जाते हैं!
मेरी ख़ुद्दारी ने एहसान किया है मुझ पर, वर्ना जो जाते हैं दरबार में खो जाते हैं| मुनव्वर राना