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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Nov 2023

    हम तो गुज़र जाएँगे!

    ‘फ़ैज़’ आते हैं रह-ए-इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम, आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Nov 2023

    कहते रहें मर जाएँगे!

    नेमत-ए-ज़ीस्त का ये क़र्ज़ चुकेगा कैसे, लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Nov 2023

    बाज़ार-ए-सुख़न!

    जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ार-ए-सुख़न, हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर* जाएँगे| *हीरे-मोती फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Nov 2023

    हम तिरी याद से!

    किस क़दर होगा यहाँ मेहर-ओ-वफ़ा का मातम, हम तिरी याद से जिस रोज़ उतर जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Nov 2023

    हम मुसाफ़िर यूँही!

    हम मुसाफ़िर यूँही मसरूफ़-ए-सफ़र जाएँगे, बे-निशाँ हो गए जब शहर तो घर जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Nov 2023

    अबके फिर गुलमोहर!

    आज एक बार मैं वरिष्ठ हिन्दी नवगीतकार सुश्री शांति सुमन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री शांति सुमन जी की यह रचना – अबके फिर गुलमोहर दहकेगाछों भर आग से लहकेकिसी संझियाए पहर में प्रतीक्षा-धुली दो आँखेंलाल-उजली मेघ पाखेंइस…

  • 21st Nov 2023

    कौन फिर ऐसे में!

    कौन फिर ऐसे में तन्क़ीद* करेगा तुझ पर, सब तिरे जुब्बा-ओ-दस्तार** में खो जाते हैं|  *विवेचना, **लंबा चोगा और पगड़ी   मुनव्वर राना

  • 21st Nov 2023

    क्या क़यामत है कि!

    क्या क़यामत है कि सहराओं के रहने वाले, अपने घर के दर-ओ-दीवार में खो जाते हैं| मुनव्वर राना 

  • 21st Nov 2023

    अख़बार में खो जाते हैं!

    ढूँढने रोज़ निकलते हैं मसाइल हमको, रोज़ हम सुर्ख़ी-ए-अख़बार में खो जाते हैं| मुनव्वर राना

  • 21st Nov 2023

    दरबार में खो जाते हैं!

    मेरी ख़ुद्दारी ने एहसान किया है मुझ पर, वर्ना जो जाते हैं दरबार में खो जाते हैं| मुनव्वर राना

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