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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Jun 2024

    हौसले ज़िंदगी के!

    हौसले ज़िंदगी के देखते हैं, चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं| राहत इंदौरी

  • 7th Jun 2024

    अभिनेता!

    आज एक बार फिर से मैं प्रसिद्ध हिन्दी व्यंग्य लेखक और कवि स्वर्गीय  रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता –  बातों का खो गया सारा अर्थशेष रह गई…

  • 6th Jun 2024

    शाम से डर लगता है

    तेरी क़ुर्बत के ये लम्हे उसे रास आएँ क्या, सुब्ह होने का जिसे शाम से डर लगता है|   वसीम बरेलवी

  • 6th Jun 2024

    तूने काँधे पे जगह दी!

    बे-सहारा था बहुत प्यार कोई पूछता क्या, तू ने काँधे पे जगह दी है तो सर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Jun 2024

    पहली बारिश में नहाया

    मैं नज़र भर के तिरे जिस्म को जब देखता हूँ, पहली बारिश में नहाया सा शजर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Jun 2024

    उम्र भर आँख की!

    एक मंज़र पे ठहरने नहीं देती फ़ितरत, उम्र भर आँख की क़िस्मत में सफ़र लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Jun 2024

    शाम का वक़्त भी!

    उस की यादों ने उगा रक्खे हैं सूरज इतने, शाम का वक़्त भी आए तो सहर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Jun 2024

    चाँद का ख़्वाब!

    चाँद का ख़्वाब उजालों की नज़र लगता है, तू जिधर हो के गुज़र जाए ख़बर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Jun 2024

    धूप है ज़्यादा, कम है छाया!

    आज एक बार फिर से मैं अपने समय के प्रसिद्ध हिन्दी गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत –  धूप है ज़्यादा, कम है छाया           आख़िर यह मौसम…

  • 5th Jun 2024

    मुसाफ़िर भटक जाएँगे

    दिन में परियों की कोई कहानी न सुन, जंगलों में मुसाफ़िर भटक जाएँगे| बशीर बद्र 

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