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अज़्मत घटा न देना!
सज़ा गुनाहों की देना उसको ज़रूर लेकिन, वो आदमी है तुम उसकी अज़्मत घटा न देना| क़तील शिफ़ाई
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तुम ऐसे लोगों को!
ख़ुलूस को जो ख़ुशामदों में शुमार कर लें, तुम ऐसे लोगों को तोहफ़तन भी वफ़ा न देना| क़तील शिफ़ाई
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उसको सदा न देना!
उसे मनाकर ग़ुरूर उस का बढ़ा न देना, वो सामने आए भी तो उसको सदा न देना| क़तील शिफ़ाई
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मुझे अक्सर अचंभा होता है -रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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अवकाश
कल से एक सप्ताह के लिए गोवा से बाहर जा रहा हूँ और लैपटॉप साथ नहीं ले जाऊंगा| अतः एक सप्ताह तक ब्लॉगिंग तथा अन्य ऑनलाइन गतिविधि बंद रहेंगी|
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अपने तमाशाइयों में हूँ!
ख़ुद ही मिसाल-ए-लाला-ए-सेहरा लहू लहू, और ख़ुद ‘फ़राज़’ अपने तमाशाइयों में हूँ| अहमद फ़राज़
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तिरे क़हक़हों में हूँ!
तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर, और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ| अहमद फ़राज़
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तिरी ख़्वाहिशों में हूँ!
मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर, ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ| अहमद फ़राज़
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तिरी महफ़िलों में हूँ!
बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू, मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ| अहमद फ़राज़
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इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ!
तू लूट कर भी अहल-ए-तमन्ना को ख़ुश नहीं, याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ| अहमद फ़राज़