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कैसे कैसे रंग जमे हैं!
ख़ुश्बू की दीवार के पीछे कैसे कैसे रंग जमे हैं, जब तक दिन का सूरज आए उस का खोज लगाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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नक़्श मिटाते रहना!
रात के दश्त में फूल खिले हैं भूली-बिसरी यादों के, ग़म की तेज़ शराब से उनके तीखे नक़्श मिटाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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घर भी जाते रहना!
अपने घरों से दूर बनों में फिरते हुए आवारा लोगो, कभी कभी जब वक़्त मिले तो अपने घर भी जाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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आग जलाते रहना!
अपना तो ये काम है भाई दिल का ख़ून बहाते रहना, जाग जाग कर इन रातों में शे‘र की आग जलाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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प्रेम के प्रति!
आज एक बार मैं हिन्दी कविता को अनंत ऊँचाइयाँ प्रदान करने वाले, ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी अमर रचना के रचयिता और छायावाद के स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निराला जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’…
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अब तो हमको भी वो!
हम दिया करते थे अग़्यार को ता‘ना जिनका, अब तो हमको भी वो आदाब-ए-वफ़ा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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कैसे हुआ याद नहीं!
एक वा‘दा था जो शीशे की तरह टूट गया, हादिसा कब ये हुआ कैसे हुआ याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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बीते हुए सावन आए!
फिर ख़यालों में वो बीते हुए सावन आए, लेकिन अब तुझ को पपीहे की सदा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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राह-नुमा याद नहीं!
रास्ते याद नहीं राह-नुमा याद नहीं, अब मुझे कुछ तिरी गलियों के सिवा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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कि फ़त्ह पाकर भी!
‘क़तील’ मुझको यही सिखाया मिरे नबी ने, कि फ़त्ह पाकर भी दुश्मनों को सज़ा न देना| क़तील शिफ़ाई