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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Dec 2023

    मिथिला!

    आज एक बार मैं  ओज और प्रेम दोनों क्षेत्रों में अमर रचनाएं देने वाले   राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर  जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| यह रचना उन्होंने ऐतिहासिक महत्व वाली पावन नगरी ‘मिथिला’ के बारे में है| दिनकर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…

  • 4th Dec 2023

    इसी उमीद पे कब से!

    इसी उमीद पे कब से धड़क रहा है दिल, तिरे हुज़ूर किसी रोज़ ये तलब होगा| शहरयार 

  • 4th Dec 2023

    यूँ तो सब होगा!

    जहाँ में होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा, तिरे लबों पे मिरे लब हों ऐसा कब होगा| शहरयार

  • 4th Dec 2023

    हुस्न की दहशत अजब!

    हुस्न की दहशत अजब थी वस्ल की शब में ‘मुनीर,’ हाथ जैसे इंतिहा-ए-शौक़ से शल* हो गया| *सुन्न मुनीर नियाज़ी

  • 4th Dec 2023

    और बोझल हो गया!

    अब कहाँ होगा वो और होगा भी तो वैसा कहाँ, सोचकर ये बात जी कुछ और बोझल हो गया| मुनीर नियाज़ी 

  • 4th Dec 2023

    मिटने का खेल!

    आज एक बार मैं  छायावाद युग की प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी  जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| महादेवी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता – मैं अनन्त पथ में लिखती जोसस्मित सपनों की बातें,उनको कभी न…

  • 3rd Dec 2023

    मैं अकेला और सफ़र!

    मैं अकेला और सफ़र की शाम रंगों में ढली, फिर ये मंज़र मेरी नज़रों से भी ओझल हो गया| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Dec 2023

    वो हवा थी शाम ही से!

    वो हवा थी शाम ही से रस्ते ख़ाली हो गए, वो घटा बरसी कि सारा शहर जल-थल हो गया| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Dec 2023

    और पागल हो गया!

    अपनी ही तेग़-ए-अदा से आप घायल हो गया, चाँद ने पानी में देखा और पागल हो गया| मुनीर नियाज़ी 

  • 3rd Dec 2023

    आप बचाते रहना!

    तुम भी ‘मुनीर’ अब उन गलियों से अपने आप को दूर ही रखना, अच्छा है झूटे लोगों से अपना-आप बचाते रहना| मुनीर नियाज़ी 

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