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तेरा इंतिज़ार नहीं!
हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं, मैं मुंतज़िर हूँ मगर तेरा इंतिज़ार नहीं| साहिर लुधियानवी
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घटता-बढ़ता देखते हैं!
तुझ को तो हर शाम फ़लक पर घटता-बढ़ता देखते हैं, उस को देख के ईद करेंगे अपना और इस्लाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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तू भी तमाम है चाँद!
अपने दिल के मश्रिक-ओ-मग़रिब उसके रुख़ से मुनव्वर हैं, बे-शक तेरा रूप भी कामिल बे-शक तू भी तमाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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भीगी शाम है चाँद!
हम से भी दो बातें कर ले कैसी भीगी शाम है चाँद, सब कुछ सुन ले आप न बोले तेरा ख़ूब निज़ाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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तुमने कितनी निर्दयता की!
आज एक बार मैं हिन्दी फिल्मों और काव्य मंचों के माध्यम से सैंकड़ों अमर गीत देने वाले स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का यह गीत – तुमने…
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तुझसे काम है चाँद!
हम इस लम्बे-चौड़े घर में शब को तन्हा होते हैं, देख किसी दिन आ मिल हमसे, हमको तुझसे काम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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नाहक़ बदनाम है चाँद!
वो जो तेरा दाग़ ग़ुलामी माथे पर लिए फिरता है, उसका नाम तो ‘इंशा’ ठहरा नाहक़ को बदनाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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कहाँ कलाम है चाँद!
सखियों से कब सखियाँ अपने जी के भेद छुपाती हैं, हम से नहीं तो उस से कह दे करता कहाँ कलाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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हर कोई जग में!
तू भी हरे दरीचे वाली आ जा बर-सर-ए-बाम है चाँद, हर कोई जग में ख़ुद सा ढूँडे तुझ बिन बसे आराम है चाँद| इब्न-ए-इंशा