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घर के रौशनदानों पर!
आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर, उसका काग़ज़ चिपका देना घर के रौशन-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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रुस्वा हो सा जाता हूँ!
तुझे बाँहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूँ उभरती है, कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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प्यासा हो सा जाता हूँ!
तिरे गुल-रंग होंटों से दहकती ज़िंदगी पीकर, मैं प्यासा और प्यासा और प्यासा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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झूटा हो सा जाता हूँ!
मैं चाहे सच ही बोलूँ हर तरह से अपने बारे में, मगर तुम मुस्कुराती हो तो झूटा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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तन्हा हो सा जाता हूँ!
मैं तुम से दूर रहता हूँ तो मेरे साथ रहती हो, तुम्हारे पास आता हूँ तो तन्हा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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अपना हो सा जाता हूँ!
मुझे मालूम है मैं सारी दुनिया की अमानत हूँ, मगर वो लम्हा जब मैं सिर्फ़ अपना हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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कलम और कुदाली!
आज एक बार मैं हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी ने साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान किया है| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता…
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तेरा भी इख़्तियार नहीं!
ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया ज़माने ने, कि अब हयात पे तेरा भी इख़्तियार नहीं| साहिर लुधियानवी
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मुझे ख़ुद अपनी !
तुम्हारे अहद-ए-वफ़ा को मैं अहद क्या समझूँ, मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत पे ए‘तिबार नहीं| साहिर लुधियानवी
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ख़ुश-गवार नहीं!
अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब, अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं| साहिर लुधियानवी