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कितना चौड़ा पाट नदी का!
आज एक बार मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और दिनमान पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता – कितना चौड़ा…
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दर्द के गीत गा सके!
अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल, कौन तिरी तरह ‘हफ़ीज़’ दर्द के गीत गा सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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हमसे नज़र मिला सके!
शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ, किसकी मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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लब न मगर हिला सके!
रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं, दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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जोश में आ चुके थे हम
होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम, बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके| हफ़ीज़ जालंधरी