कितना चौड़ा पाट नदी का!

आज एक बार मैं  हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और दिनमान पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे  स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता –

कितना चौड़ा पाट नदी का
कितनी भारी शाम
कितने खोए – खोए से हम
कितना तट निष्काम

कितनी बहकी – बहकी-सी
दूरागत वंशी टेर
कितनी टूटी – टूटी-सी
नभ पर विहंगों की फेर

कितनी सहमी – सहमी-सी
क्षिति की सुरमई पिपासा
कितनी सिमटी – सिमटी-सी
जल पर तट तरु अभिलाषा

कितनी चुप – चुप गई रोशनी
छिप – छिप आई रात
कितनी सिहर – सिहर कर
अधरों से फूटी दो बात

चार नयन मुस्काए
खोए, भीगे फिर पथराए
कितनी बड़ी विवशता
जीवन की कितनी कह पाए ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                                  ********  

7 responses to “कितना चौड़ा पाट नदी का!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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  2. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    ❣️

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  3. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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  4. कबीर कहे मैं पूरा पाया। वही व्यक्ति पूरी कह पाये जो पूरा पा सके। और पूरा पाने के लिए भागदौड़ से मुक्त होकर जीवन में ठहरना होता है, होंश साधना होता है।

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    1. धन्यवाद जी।

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