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वो तिरा रो रो के!
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़, वो तिरा रो रो के मुझको भी रुलाना याद है| हसरत मोहानी
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बातों में जताना याद है!
तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़, हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है| हसरत मोहानी
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वो मुँह छुपाना याद है!
खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ‘तन, और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है| हसरत मोहानी
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उँगली दबाना याद है!
तुझसे कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा, और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है| हसरत मोहानी
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वो ज़माना याद है!
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है, हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है| हसरत मोहानी
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तिरा क्या ख़याल है!
फिर कोई ख़्वाब देखूँ कोई आरज़ू करूँ, अब ऐ दिल-ए-तबाह तिरा क्या ख़याल है| जावेद अख़्तर
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ये मेरा ही जाल है!
बे-दस्त-ओ-पा हूँ आज तो इल्ज़ाम किसको दूँ, कल मैंने ही बुना था ये मेरा ही जाल है| जावेद अख़्तर
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जो शीशे में बाल है!
आसूदगी* से दिल के सभी दाग़ धुल गए, लेकिन वो कैसे जाए जो शीशे में बाल है| *खुशहाली जावेद अख़्तर