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और मैं क्या क्या देखूँ!
अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ, इक ज़रा शेर कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ| परवीन शाकिर
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शिल्पी रात!
आज मैं विख्यात हिन्दी साहित्यकार स्वर्गीय कुबेरनाथ राय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जिनको भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था| इनकी रचना मैं आज पहली बार शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुबेरनाथ राय जी की यह कविता – चन्द्रवर्णी रातगढ़ रही है काष्ठ चन्दनमॅंह-मॅंह…
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न गए बग़ैर ‘नज़ीर’ के!
कहीं तुम को जाना हुआ अगर न गए बग़ैर ‘नज़ीर’ के, वो ज़माना अपने ‘नज़ीर’ का तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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हाथ में यही हाथ था!
मिरे शाने पर यही ज़ुल्फ़ थी जो है आज मुझ से खिंची खिंची, मिरे हाथ में यही हाथ था तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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टूटे साज़ की वो सदा!
मिरी बेबसी ने ज़बान तक जिसे ला के तुमको रुला दिया, मिरे टूटे साज़ की वो सदा तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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तुमने दी थीं तसल्लियाँ
मिरी बे-क़रारियाँ देखकर मुझे तुमने दी थीं तसल्लियाँ, मिरा चेहरा फिर भी उदास था तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी