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इक ज़माना गुज़र गया!
वो तुम्हारा कहना कि जाएँगे अगर आ सके तो फिर आएँगे, उसे इक ज़माना गुज़र गया तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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याद हो कि न याद हो!
हुए मुझ से जिस घड़ी तुम जुदा तुम्हें याद हो कि न याद हो, मिरी हर नज़र थी इक इल्तिजा तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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और जवानी में!
इस तरह गुज़रा है बचपन कि खिलौने न मिले, और जवानी में बुढ़ापे से मुलाक़ात हुई| मंज़र भोपाली
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किरण के पाँव!
आज एक बार मैं मेरे अत्यंत प्रिय हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – दे दो सवेरे को क़दमटूटे अँधेरे का अहम्निर्दोष दीपक…
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मौक़ा था वहीं मात हुई!
इसी होनी को तो क़िस्मत का लिखा कहते हैं, जीतने का जहाँ मौक़ा था वहीं मात हुई| मंज़र भोपाली
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ख़ुद से मुलाक़ात हुई!
कोई हसरत कोई अरमाँ कोई ख़्वाहिश ही न थी, ऐसे आलम में मिरी ख़ुद से मुलाक़ात हुई| मंज़र भोपाली
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दिन भी डूबा कि नहीं!
दिन भी डूबा कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं, जिस जगह बुझ गए आँखों के दिए रात हुई| मंज़र भोपाली
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टूट के बरसात हुई!
आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई, ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई| मंज़र भोपाली