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मैं कोई मोम नहीं हूँ!
सोज़ भर दो मिरे सपने में ग़म-ए-उल्फ़त का, मैं कोई मोम नहीं हूँ जो पिघल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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हम सब काशी के पंडे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर और मेरे लिए गुरुतुल्य रहे, अत्यंत सरल स्वभाव के धनी स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का…
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तेरा वा’दा तो नहीं हूँ!
मेरी तक़दीर में जलना है तो जल जाऊँगा, तेरा वा‘दा तो नहीं हूँ जो बदल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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गुज़रे जिधर से हम!
माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके, कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम| साहिर लुधियानवी
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किसी की नज़र से हम!
ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है, क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम| साहिर लुधियानवी
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कुछ और बढ़ गए जो!
कुछ और बढ़ गए जो अँधेरे तो क्या हुआ, मायूस तो नहीं हैं तुलू-ए-सहर* से हम| *Sunrise साहिर लुधियानवी
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ज़माने के डर से हम!
भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागर से हम, ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम| साहिर लुधियानवी
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फिर मुझको रसखान बना दे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी कवि सम्मेलनों और उर्दू मुशायरों में जिनको समान रुचि के साथ श्रोताओं द्वारा सुना जाता था, ऐसे स्वर्गीय बेकल उत्साही जी का गीत शेयर कर रहा हूँ| बेकल जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय बेकल उत्साही जी…
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आग का दरिया देखूँ!
टूट जाएँ कि पिघल जाएँ मिरे कच्चे घड़े, तुझ को मैं देखूँ कि ये आग का दरिया देखूँ| परवीन शाकिर
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और भी तुझ सा देखूँ!
तू मिरी तरह से यकता है मगर मेरे हबीब, जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ| परवीन शाकिर