हम सब काशी के पंडे!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर और मेरे लिए गुरुतुल्य रहे, अत्यंत सरल स्वभाव के धनी स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का नवगीत शेयर कर रहा हूँ|  

बेचैन जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

नन्हें-नन्हें हाथों में
लंबे-लंबे हथकंडे ।
चौड़े-चौड़े चौराहे
सिमटे-सिमटे-से आँगन
खोटे सिक्कों में बिकते
उजले-उजले वृंदावन
अपने अपने घाटों पर
हम सब काशी के पंडे ।


प्यासे-प्यासे होठों को
देकर ह्विस्की की बोतल
ढाल प्राण के प्यालों में
कलयुग का नव गंगाजल
इस दुनिया के होटल में
मौज उड़ाते मुस्टंडे।


चमचों को बादामगिरी
ख़ाली पेटों की थाली
अब भी ख़ाली-ख़ाली है
कल भी थी ख़ाली-ख़ाली
भ्रष्टाचारों के कर में
हैं सच्चाई के झंडे ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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One response to “हम सब काशी के पंडे!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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