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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Jul 2026

    गर्मियां!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय त्रिनेत्र जोशी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय त्रिनेत्र जोशी जी की यह कविता- गुमसुम से इस मौसम मेंजब नहीं आती हवाएँसूखे होंठों वाली पत्तियाँबार-बार चोंचें खोलती चिड़ियाएँहरियाली पर लगी फफूँद कोई भी नहीं आताखिड़कियों…

  • 10th Jul 2026

    तो कोई मेहरबाँ क्यूँ हो!

    उम्मीदें सारी दुनिया से ‘वसीम’ और ख़ुद में ऐसे ग़म,किसी पे कुछ न ज़ाहिर हो तो कोई मेहरबाँ क्यूँ हो| वसीम बरेलवी

  • 10th Jul 2026

    जब भी इस शहर में !

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है मेरे स्वर में नीरज जी की ग़ज़ल का पहला शेर – जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******

  • 10th Jul 2026

    शराफ़त दरमियाँ क्यूँ हो!

    मोहब्बत आसमाँ को जब ज़मीं करने की ज़िद ठहरी,तो फिर बुज़दिल उसूलों की शराफ़त दरमियाँ क्यूँ हो| वसीम बरेलवी

  • 10th Jul 2026

    उस घर में धुआँ क्यूँ हो!

    बिखर कर रह गया हमसायगी का ख़्वाब ही वर्ना,दिए इस घर में रौशन हों तो उस घर में धुआँ क्यूँ हो| वसीम बरेलवी

  • 10th Jul 2026

    जिस दिल में बसा था प्यार !

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है मेरे स्वर में यह गीत- जिस दिल में बसा था प्यार तेरा उस दिल को कभी का तोड़ दियाफिल्म- सहेली मुख्य कलाकार- रहमान, कल्पना आदि गीतकार- इंदीवर संगीतकार- कल्याणजी आनंदजी गायक- मुकेश प्रस्तुति- श्रीकृष्ण शर्मा आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******

  • 10th Jul 2026

    क्षण भर को क्यों प्यार किया था!

    आज मैं हिंदी गीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। बच्चन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय हरिवंश राय जी का यह गीत– क्षण भर को क्यों प्यार किया था? अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,पलक संपुटों में मदिरा…

  • 9th Jul 2026

    किसी का दिल दुखाने ही!

    हमारी गुफ़्तुगू की और भी सम्तें बहुत सी हैं, किसी का दिल दुखाने ही को फिर अपनी ज़बाँ क्यूँ हो| वसीम बरेलवी

  • 9th Jul 2026

    न समझे जो ज़मीं के ग़म !

    सवाल आख़िर ये इक दिन देखना हम ही उठाएँगे,न समझे जो ज़मीं के ग़म वो अपना आसमाँ क्यूँ हो| वसीम बरेलवी

  • 9th Jul 2026

    आती रुत मुझे रोएगी!

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है मेरे स्वर में नासिर काज़मी जी की ग़ज़ल का अंतिम शेर जिसे ग़ुलाम अली जी ने गाया है- आती रुत मुझे रोएगी जाती रुत का झोंका हूँ! आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। *******

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