किसी का दिल दुखाने ही!

हमारी गुफ़्तुगू की और भी सम्तें बहुत सी हैं,

किसी का दिल दुखाने ही को फिर अपनी ज़बाँ क्यूँ हो|

वसीम बरेलवी

2 responses to “किसी का दिल दुखाने ही!”

    1. हार्दिक आभार जी

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