न समझे जो ज़मीं के ग़म !

सवाल आख़िर ये इक दिन देखना हम ही उठाएँगे,
न समझे जो ज़मीं के ग़म वो अपना आसमाँ क्यूँ हो|

वसीम बरेलवी

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