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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 28th Jan 2024

    ए’तिबार जाता रहा!

    खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा, ख़ुलूस तो है मगर ए‘तिबार जाता रहा|             जावेद अख़्तर

  • 28th Jan 2024

    तुम चलती गईं- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 27th Jan 2024

    ईसा की पैदाइश पर!

    शायद तीन नुजूमी* मेरी मौत पे आ कर पहुँचेंगे, ऐसा ही इक बार हुआ था ईसा की पैदाइश पर| *सितारों के जानकार                 गुलज़ार

  • 27th Jan 2024

    आँगन में दीवार चुनी!

    धूप और छाँव बाँट के तुम ने आँगन में दीवार चुनी, क्या इतना आसान है ज़िंदा रहना इस आसाइश पर|                 गुलज़ार

  • 27th Jan 2024

    कोई एक रिहाइश पर!

    दिल का हुज्रा* कितनी बार उजड़ा भी और बसाया भी, सारी उम्र कहाँ ठहरा है कोई एक रिहाइश पर| *कोठरी                  गुलज़ार

  • 27th Jan 2024

    रात अँधेरी खिड़की पर

    काग़ज़ का इक चाँद लगा कर रात अँधेरी खिड़की पर, दिल में कितने ख़ुश थे अपनी फ़ुर्क़त की आराइश पर|                   गुलज़ार

  • 27th Jan 2024

    करवट की गुंजाइश पर

    मुँह मोड़ा और देखा कितनी दूर खड़े थे हम दोनों, आप लड़े थे हम से बस इक करवट की गुंजाइश पर|                 गुलज़ार

  • 27th Jan 2024

    भाई-बहन! 

    आज एक बार फिर से मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता – तू…

  • 26th Jan 2024

    रिश्तों की पैमाइश पर!

    फ़ासले हैं भी और नहीं भी नापा तौला कुछ भी नहीं, लोग ब-ज़िद रहते हैं फिर भी रिश्तों की पैमाइश पर|                 गुलज़ार 

  • 26th Jan 2024

    ओस पड़ी थी रात!

    ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर, सैली सी ख़ामोशी में आवाज़ सुनी फ़रमाइश पर|                  गुलज़ार

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