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ए’तिबार जाता रहा!
खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा, ख़ुलूस तो है मगर ए‘तिबार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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तुम चलती गईं- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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ईसा की पैदाइश पर!
शायद तीन नुजूमी* मेरी मौत पे आ कर पहुँचेंगे, ऐसा ही इक बार हुआ था ईसा की पैदाइश पर| *सितारों के जानकार गुलज़ार
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आँगन में दीवार चुनी!
धूप और छाँव बाँट के तुम ने आँगन में दीवार चुनी, क्या इतना आसान है ज़िंदा रहना इस आसाइश पर| गुलज़ार
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कोई एक रिहाइश पर!
दिल का हुज्रा* कितनी बार उजड़ा भी और बसाया भी, सारी उम्र कहाँ ठहरा है कोई एक रिहाइश पर| *कोठरी गुलज़ार
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रात अँधेरी खिड़की पर
काग़ज़ का इक चाँद लगा कर रात अँधेरी खिड़की पर, दिल में कितने ख़ुश थे अपनी फ़ुर्क़त की आराइश पर| गुलज़ार
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भाई-बहन!
आज एक बार फिर से मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता – तू…
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रिश्तों की पैमाइश पर!
फ़ासले हैं भी और नहीं भी नापा तौला कुछ भी नहीं, लोग ब-ज़िद रहते हैं फिर भी रिश्तों की पैमाइश पर| गुलज़ार
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ओस पड़ी थी रात!
ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर, सैली सी ख़ामोशी में आवाज़ सुनी फ़रमाइश पर| गुलज़ार