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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th Aug 2024

    कभी निगाह में जो था!

    कभी जो सीने में इक आग थी वो सर्द हुई, कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा| जावेद अख़्तर

  • 14th Aug 2024

    किसी की आँख में!

    किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही, मगर कभी जो हमें था ख़ुमार जाता रहा| जावेद अख़्तर

  • 14th Aug 2024

    ख़ुलूस तो है मगर!

    खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा, ख़ुलूस तो है मगर ए’तिबार जाता रहा| जावेद अख़्तर

  • 14th Aug 2024

    प्रिया से!

    आज एक बार फिर मैं छायावाद के प्रमुख स्तंभ और कविता के शीर्ष पुरुष महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|निराला जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता- मेरे इस जीवन की है तू सरस साधना…

  • 13th Aug 2024

    कुछ मेरे तरफ़-दार!

    जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल, कुछ अदू* के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं| *Opponent गुलज़ार

  • 13th Aug 2024

    रूह से छीले हुए!

    रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं, हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं| गुलज़ार

  • 13th Aug 2024

    वक़्त के तीर तो!

    वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने, और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं| गुलज़ार

  • 13th Aug 2024

    उन के साए अभी!

    कल तवारीख़ में दफ़नाए गए थे जो लोग, उन के साए अभी दरवाज़ों पे बेदार से हैं| गुलज़ार

  • 13th Aug 2024

    चढ़ते सैलाब में!

    चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया, लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं| गुलज़ार

  • 13th Aug 2024

    लोग हैं अख़बार से हैं!

    नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब* में हूँ, और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं| *भंवर गुलज़ार

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