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रास्ता खुलता नहीं कहीं
होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं, जंगल सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली
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भारतीय संगीत अनुभव संग्रहालय!
मैंने अपनी भ्रमण से संबंधित पोस्ट्स में अन्य स्थानों के अलावा कुछ संग्रहालयों को भी कवर किया है| अधिकतर संग्रहालय हमारे अतीत के विवरणों की, राजा-महाराजाओं के शासन काल की जानकारी देते हैं, जिनमें ललित कलाओं, परंपराओं आदि की भी जानकारी मिलती है, लेकिन युद्धों और युद्ध के हथियारों और विभिन्न सिक्कों आदि की जानकारी…
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उलझा हुआ सा कुछ!
देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ, हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली
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जिस्म घायल है मगर!
थक के गिरता है हिरन सिर्फ़ शिकारी के लिए, जिस्म घायल है मगर आँखों में रम बाक़ी है| निदा फ़ाज़ली
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जंग के फ़ैसले!
जंग के फ़ैसले मैदाँ में कहाँ होते हैं, जब तलक हाफ़िज़े* बाक़ी हैं अलम बाक़ी है| *रक्षक निदा फ़ाज़ली
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उसकी क़लम बाक़ी है!
मैंने पूछा था सबब पेड़ के गिर जाने का, उठ के माली ने कहा उसकी क़लम बाक़ी है| निदा फ़ाज़ली
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क़सम बाक़ी है!
अब न वो छत है न वो ज़ीना न अंगूर की बेल, सिर्फ़ इक उसको भुलाने की क़सम बाक़ी है| निदा फ़ाज़ली
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ये ग़म बाक़ी है!
उसको खो देने का एहसास तो कम बाक़ी है, जो हुआ वो न हुआ होता ये ग़म बाक़ी है| निदा फ़ाज़ली
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खाली समय में!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता…
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उजाला तो नहीं!
उजाला तो नहीं कह सकते इस को हम लेकिन, ज़रा सी कम तो हुई है ये तीरगी देखो| जावेद अख़्तर