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न जाने क्या है वो!
जो दूर जाए तो ग़म है जो पास आए तो दर्द, न जाने क्या है वो कम्बख़्त आदमी देखो| जावेद अख़्तर
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जो हो सके तो!
जो हो सके तो ज़ियादा ही चाहना मुझ को, कभी जो मेरी मोहब्बत में कुछ कमी देखो| जावेद अख़्तर
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जिसे भी चाहे वो चाहे!
मोहब्बतों में कहाँ अपने वास्ते फ़ुर्सत, जिसे भी चाहे वो चाहे मिरी ख़ुशी देखो| जावेद अख़्तर
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जब आईना कोई देखो!
जब आईना कोई देखो इक अजनबी देखो, कहाँ पे लाई है तुम को ये ज़िंदगी देखो| जावेद अख़्तर
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मैं ये उमीद लिए!
कभी तो मेरी भी सुनवाई होगी महफ़िल में, मैं ये उमीद लिए बार बार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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क्यों टेरा!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के अंदाज़ में बहुत गहरी बात कह जाते थे| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी…
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जैसे क़रार जाता रहा!
अजब सा चैन था हम को कि जब थे हम बेचैन, क़रार आया तो जैसे क़रार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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आग थी वो सर्द हुई!
कभी जो सीने में इक आग थी वो सर्द हुई, कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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था ख़ुमार जाता रहा!
किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही, मगर कभी जो हमें था ख़ुमार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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ए’तिबार जाता रहा!
खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा, ख़ुलूस तो है मगर ए‘तिबार जाता रहा| जावेद अख़्तर