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तिरा हमसफ़र कहाँ है
उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे, मुझे रोक रोक पूछा तिरा हम-सफ़र कहाँ है| बशीर बद्र
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मिरा प्यार जावेदाँ है!
मैं इसी गुमाँ में बरसों बड़ा मुतमइन रहा हूँ, तिरा जिस्म बे-तग़य्युर* मिरा प्यार जावेदाँ** है| *निर्विकार, **अमर बशीर बद्र
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वही ग़म का आसमाँ है!
मिरे साथ चलने वाले तुझे क्या मिला सफ़र में, वही दुख-भरी ज़मीं है वही ग़म का आसमाँ है| बशीर बद्र
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मैंने अपने गानों को जन्म दिया!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार और कवि स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – मैंने अपने गानों को जन्म दियाएकदम चुपचाप-अकेले,पर फिर…
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तिरे मेरे दरमियाँ है!
कभी पा के तुझ को खोना कभी खो के तुझ को पाना, ये जनम जनम का रिश्ता तिरे मेरे दरमियाँ है| बशीर बद्र
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वो अगर ख़फ़ा नहीं है!
वही शख़्स जिस पे अपने दिल-ओ-जाँ निसार कर दूँ, वो अगर ख़फ़ा नहीं है तो ज़रूर बद-गुमाँ है| बशीर बद्र
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कोई दूसरा कहाँ है!
ये चराग़ बे-नज़र है ये सितारा बे-ज़बाँ है, अभी तुझ से मिलता-जुलता कोई दूसरा कहाँ है| बशीर बद्र
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चमकता हुआ सा कुछ!
धुँदली सी एक याद किसी क़ब्र का दिया, और मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली
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रोता हुआ सा कुछ!
फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह, हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली
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बिखरता हुआ सा कुछ!
साहिल की गीली रेत पर बच्चों के खेल सा, हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली