कोई एक रिहाइश पर!

दिल का हुज्रा* कितनी बार उजड़ा भी और बसाया भी,

सारी उम्र कहाँ ठहरा है कोई एक रिहाइश पर|

*कोठरी

                 गुलज़ार

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