-
ये ज़ुल्म न ढाओ इंशा-जी!
जितने भी यहाँ के बासी हैं सब के सब तुमसे प्यार करें, क्या उनसे भी मुँह फेरोगे ये ज़ुल्म न ढाओ इंशा-जी| क़तील शिफ़ाई
-
इसे छोड़ न जाओ इंशा-जी!
ये किसने कहा तुम कूच करो बातें न बनाओ इंशा-जी, ये शहर तुम्हारा अपना है इसे छोड़ न जाओ इंशा-जी|(Tribute to Ibne Insha) क़तील शिफ़ाई
-
सत्य!
आज मैं बाबा नागार्जुन जी की आपातकाल में लिखी गई एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| जनकवि बाबा नागार्जुन जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन जी की यह कविता – सत्य को लकवा मार गया हैवह लंबे काठ की तरहपड़ा रहता है सारा दिन, सारी…
-
मुलाक़ात की कोशिश नहीं की!
वो हमें भूल गया हो तो अजब क्या है ‘फ़राज़’, हम ने भी मेल-मुलाक़ात की कोशिश नहीं की| अहमद फ़राज़
-
अपने क़बीले की हिफ़ाज़त के लिए!
कट मरे अपने क़बीले की हिफ़ाज़त के लिए, मक़्तल-ए-शहर में ठहरे रहे जुम्बिश नहीं की| अहमद फ़राज़
-
दश्त पे तू ने कभी बारिश नहीं की!
ऐ मिरे अब्र-ए-करम देख ये वीराना-ए-जाँ, क्या किसी दश्त पे तू ने कभी बारिश नहीं की| अहमद फ़राज़