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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th May 2023

    पलटकर तिरी आँखें!

    मैं संग-सिफ़त एक ही रस्ते में खड़ा हूँ, शायद मुझे देखेंगी पलट कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी  

  • 14th May 2023

    चादर तिरी आँखें!

    मुमकिन हो तो इक ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ, फिर ओढ़ न लें ख़्वाब की चादर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी

  • 14th May 2023

    मंज़र तिरी आँखें!

    अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता, भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी   

  • 14th May 2023

    खुलती हैं बहुत दिल में

    बोझल नज़र आती हैं ब-ज़ाहिर मुझे लेकिन, खुलती हैं बहुत दिल में उतर कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी   

  • 14th May 2023

    अपनी गंध नहीं बेचूंगा!

    आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि और राजनेता, स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| बैरागी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह कविता  – चाहे सभी सुमन बिक जाएंचाहे ये उपवन बिक जाएंचाहे सौ फागुन बिक जाएंपर मैं…

  • 13th May 2023

    गौहर तेरी आँखें!

    ख़ाली जो हुई शाम-ए-ग़रीबाँ की हथेली, क्या क्या न लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें| मोहसिन नक़वी

  • 13th May 2023

    बिछड़कर तिरी आँखें!

    फिर कौन भला दाद-ए-तबस्सुम उन्हें देगा, रोएँगी बहुत मुझ से बिछड़कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी  

  • 13th May 2023

    समुंदर तिरी आँखें!

    भड़काएँ मिरी प्यास को अक्सर तिरी आँखें, सहरा मिरा चेहरा है समुंदर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी

  • 13th May 2023

    क्या ख़ुदा से रहे!

    उसके बंदों को देख कर कहिए, हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे| जावेद अख़्तर

  • 13th May 2023

    पी के प्यासे रहे!

    ज़िंदगी की शराब माँगते हो, हमको देखो कि पी के प्यासे रहे| जावेद अख़्तर

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