-
कभी बशर में कभी
ख़ुदा तो मालिक-ओ-मुख़्तार है कहीं भी रहे, कभी बशर में कभी जानवर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
-
मगर वो ख़ौफ़ जो!
लड़ाई देखे हुए दुश्मनों से मुमकिन है, मगर वो ख़ौफ़ जो दीवार-ओ-दर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
-
सफ़र में रहता है!
न जाने कौन सा मंज़र नज़र में रहता है, तमाम उम्र मुसाफ़िर सफ़र में रहता है| निदा फ़ाज़ली
-
चिड़ियाँ हैं न पुरवाई है!
अब नज़र आता नहीं कुछ भी दुकानों के सिवा, अब न बादल हैं न चिड़ियाँ हैं न पुरवाई है| निदा फ़ाज़ली
-
भूक है महँगाई है!
तीन चौथाई से ज़ाइद हैं जो आबादी में, उनके ही वास्ते हर भूक है महँगाई है| निदा फ़ाज़ली
-
इंसान की तन्हाई है!
इतनी ख़ूँ-ख़ार न थीं पहले इबादत-गाहें, ये अक़ीदे हैं कि इंसान की तन्हाई है| निदा फ़ाज़ली
-
कोई हिन्दू, मुस्लिम
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है, सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है| निदा फ़ाज़ली
-
वो काँच का पैकर है
यूँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं ‘मोहसिन’, वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी