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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th May 2023

    कभी बशर में कभी

    ख़ुदा तो मालिक-ओ-मुख़्तार है कहीं भी रहे, कभी बशर में कभी जानवर में रहता है| निदा फ़ाज़ली

  • 15th May 2023

    मगर वो ख़ौफ़ जो!

    लड़ाई देखे हुए दुश्मनों से मुमकिन है, मगर वो ख़ौफ़ जो दीवार-ओ-दर में रहता है| निदा फ़ाज़ली 

  • 15th May 2023

    सफ़र में रहता है!

    न जाने कौन सा मंज़र नज़र में रहता है, तमाम उम्र मुसाफ़िर सफ़र में रहता है| निदा फ़ाज़ली

  • 15th May 2023

    चिड़ियाँ हैं न पुरवाई है!

    अब नज़र आता नहीं कुछ भी दुकानों के सिवा, अब न बादल हैं न चिड़ियाँ हैं न पुरवाई है| निदा फ़ाज़ली

  • 15th May 2023

    तस्वीर उतरवाई है!

    देखे कब तलक बाक़ी रहे सज-धज उसकी, आज जिस चेहरे से तस्वीर उतरवाई है| निदा फ़ाज़ली

  • 15th May 2023

    भूक है महँगाई है!

    तीन चौथाई से ज़ाइद हैं जो आबादी में, उनके ही वास्ते हर भूक है महँगाई है| निदा फ़ाज़ली

  • 15th May 2023

    इंसान की तन्हाई है!

    इतनी ख़ूँ-ख़ार न थीं पहले इबादत-गाहें, ये अक़ीदे हैं कि इंसान की तन्हाई है| निदा फ़ाज़ली

  • 15th May 2023

    रात भर पानी बरसता!

    आज मैं अपने समय में मंचों पर अपनी अलग ही अलग छाप बनाने वाले, स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| सरोज जी की काव्य प्रस्तुति की अपनी ही अलग शैली थी, उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज…

  • 14th May 2023

    कोई हिन्दू, मुस्लिम

    कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है, सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है| निदा फ़ाज़ली

  • 14th May 2023

    वो काँच का पैकर है

    यूँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं ‘मोहसिन’, वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी

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