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मेरी राह मत रोको!
आज एक बार फिर से मैं अपने समय में काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले कवि स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| निर्धन जी का काव्य प्रस्तुति का अपना ही अलग अंदाज़ था, उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय शिशुपाल…
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उदासी से भर गए होते
बहुत दिनों से है दिल अपना ख़ाली ख़ाली सा, ख़ुशी नहीं तो उदासी से भर गए होते| बशीर बद्र
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फूल चुन लिए वर्ना
ग़ज़ल ने बहते हुए फूल चुन लिए वर्ना, ग़मों में डूब कर हम लोग मर गए होते| बशीर बद्र
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सिंगार-दान में रहते हो
सिंगार-दान में रहते हो आइने की तरह, किसी के हाथ से गिर कर बिखर गए होते| बशीर बद्र
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दुनिया बदल सकती है
बदलना चाहो तो दुनिया बदल भी सकती है, अजब फ़ुतूर सा हर वक़्त सर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
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मेरे घर में रहता है!
जो मिलना चाहो तो मुझ से मिलो कहीं बाहर, वो कोई और है जो मेरे घर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
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बन गई कविता मेरी!
एक बार फिर से मैं आज अपने समय के अत्यंत प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंग जी की काव्य प्रस्तुति की अपनी ही अलग शैली थी, उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का…
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सूरज सहर में रहता है
अजीब दौर है ये तय-शुदा नहीं कुछ भी, न चाँद शब में न सूरज सहर में रहता है| निदा फ़ाज़ली