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हुस्न की दहशत अजब!
हुस्न की दहशत अजब थी वस्ल की शब में ‘मुनीर,’ हाथ जैसे इंतिहा-ए-शौक़ से शल* हो गया| *सुन्न मुनीर नियाज़ी
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और बोझल हो गया!
अब कहाँ होगा वो और होगा भी तो वैसा कहाँ, सोचकर ये बात जी कुछ और बोझल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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मिटने का खेल!
आज एक बार मैं छायावाद युग की प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| महादेवी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता – मैं अनन्त पथ में लिखती जोसस्मित सपनों की बातें,उनको कभी न…
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मैं अकेला और सफ़र!
मैं अकेला और सफ़र की शाम रंगों में ढली, फिर ये मंज़र मेरी नज़रों से भी ओझल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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वो हवा थी शाम ही से!
वो हवा थी शाम ही से रस्ते ख़ाली हो गए, वो घटा बरसी कि सारा शहर जल-थल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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और पागल हो गया!
अपनी ही तेग़-ए-अदा से आप घायल हो गया, चाँद ने पानी में देखा और पागल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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कैसे कैसे रंग जमे हैं!
ख़ुश्बू की दीवार के पीछे कैसे कैसे रंग जमे हैं, जब तक दिन का सूरज आए उस का खोज लगाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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नक़्श मिटाते रहना!
रात के दश्त में फूल खिले हैं भूली-बिसरी यादों के, ग़म की तेज़ शराब से उनके तीखे नक़्श मिटाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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घर भी जाते रहना!
अपने घरों से दूर बनों में फिरते हुए आवारा लोगो, कभी कभी जब वक़्त मिले तो अपने घर भी जाते रहना| मुनीर नियाज़ी