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मिरा दिल दुखा गया!
क्यूँ आज उसका ज़िक्र मुझे ख़ुश न कर सका, क्यूँ आज उसका नाम मिरा दिल दुखा गया| शहरयार
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मेरे लहू से लिखा गया!
किस किस तरह से मुझ को न रुस्वा किया गया, ग़ैरों का नाम मेरे लहू से लिखा गया| शहरयार
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जो हादिसा नहीं!
न जाने क्यूँ मुझे लगता है ऐसा हाकिम-ए-शहर, जो हादिसा नहीं पहले हुआ वो अब होगा| शहरयार
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क्या ग़ज़ब होगा!
कोई नहीं है जो बतलाए मेरे लोगों को, हवा के रुख़ के बदलने से क्या ग़ज़ब होगा| शहरयार
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मिथिला!
आज एक बार मैं ओज और प्रेम दोनों क्षेत्रों में अमर रचनाएं देने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| यह रचना उन्होंने ऐतिहासिक महत्व वाली पावन नगरी ‘मिथिला’ के बारे में है| दिनकर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…
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यूँ तो सब होगा!
जहाँ में होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा, तिरे लबों पे मिरे लब हों ऐसा कब होगा| शहरयार