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आग जलाते रहना!
अपना तो ये काम है भाई दिल का ख़ून बहाते रहना, जाग जाग कर इन रातों में शे‘र की आग जलाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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प्रेम के प्रति!
आज एक बार मैं हिन्दी कविता को अनंत ऊँचाइयाँ प्रदान करने वाले, ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी अमर रचना के रचयिता और छायावाद के स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निराला जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’…
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अब तो हमको भी वो!
हम दिया करते थे अग़्यार को ता‘ना जिनका, अब तो हमको भी वो आदाब-ए-वफ़ा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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कैसे हुआ याद नहीं!
एक वा‘दा था जो शीशे की तरह टूट गया, हादिसा कब ये हुआ कैसे हुआ याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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बीते हुए सावन आए!
फिर ख़यालों में वो बीते हुए सावन आए, लेकिन अब तुझ को पपीहे की सदा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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राह-नुमा याद नहीं!
रास्ते याद नहीं राह-नुमा याद नहीं, अब मुझे कुछ तिरी गलियों के सिवा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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कि फ़त्ह पाकर भी!
‘क़तील’ मुझको यही सिखाया मिरे नबी ने, कि फ़त्ह पाकर भी दुश्मनों को सज़ा न देना| क़तील शिफ़ाई
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अज़्मत घटा न देना!
सज़ा गुनाहों की देना उसको ज़रूर लेकिन, वो आदमी है तुम उसकी अज़्मत घटा न देना| क़तील शिफ़ाई
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तुम ऐसे लोगों को!
ख़ुलूस को जो ख़ुशामदों में शुमार कर लें, तुम ऐसे लोगों को तोहफ़तन भी वफ़ा न देना| क़तील शिफ़ाई
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उसको सदा न देना!
उसे मनाकर ग़ुरूर उस का बढ़ा न देना, वो सामने आए भी तो उसको सदा न देना| क़तील शिफ़ाई