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अवकाश
कल से एक सप्ताह के लिए गोवा से बाहर जा रहा हूँ और लैपटॉप साथ नहीं ले जाऊंगा| अतः एक सप्ताह तक ब्लॉगिंग तथा अन्य ऑनलाइन गतिविधि बंद रहेंगी|
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अपने तमाशाइयों में हूँ!
ख़ुद ही मिसाल-ए-लाला-ए-सेहरा लहू लहू, और ख़ुद ‘फ़राज़’ अपने तमाशाइयों में हूँ| अहमद फ़राज़
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तिरे क़हक़हों में हूँ!
तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर, और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ| अहमद फ़राज़
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तिरी ख़्वाहिशों में हूँ!
मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर, ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ| अहमद फ़राज़
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तिरी महफ़िलों में हूँ!
बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू, मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ| अहमद फ़राज़
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इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ!
तू लूट कर भी अहल-ए-तमन्ना को ख़ुश नहीं, याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ| अहमद फ़राज़
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कब से उदासियों के!
ऐ यार-ए-ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं, कब से उदासियों के घने जंगलों में हूँ| अहमद फ़राज़
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उन्हीं गहराइयों में हूँ!
तू आ चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं, बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूँ| अहमद फ़राज़
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गाँव का परिचय!
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज एक बार फिर से मैं, अपनी अलग किस्म की रचनाओं के माध्यम से किसी समय हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| निर्धन जी की…
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सभी रास्तों में हूँ!
मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल, मैं संग-ए-राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ| अहमद फ़राज़