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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Nov 2023

    मैं दुश्मनों में हूँ !

    तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ, मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ| अहमद फ़राज़

  • 23rd Nov 2023

    मज़ा नहीं बाक़ी!

    हो चुका ख़त्म अहद-ए-हिज्र-ओ-विसाल, ज़िंदगी में मज़ा नहीं बाक़ी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 23rd Nov 2023

    कोई गिला नहीं बाक़ी!

    तेरी चश्म-ए-अलम-नवाज़ की ख़ैर, दिल में कोई गिला नहीं बाक़ी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 

  • 23rd Nov 2023

    या वफ़ा नहीं बाक़ी!

    अपनी मश्क़-ए-सितम से हाथ न खींच, मैं नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 23rd Nov 2023

    क्या नहीं बाक़ी!

    इक तिरी दीद छिन गई मुझसे, वर्ना दुनिया में क्या नहीं बाक़ी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 

  • 23rd Nov 2023

    क़ैद इतने बरस!

    आज एक बार मैं वरिष्ठ हिन्दी कवि और ग़ज़ल लेखक श्री सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| गुप्त जी की कुछ ग़ज़लें वास्तव में बहुत खूबसूरत हैं| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सूर्यभानु गुप्त जी की यह ग़ज़ल  – क़ैद इतने बरस…

  • 22nd Nov 2023

    हौसला नहीं बाक़ी!

    हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाक़ी, ज़ब्त का हौसला नहीं बाक़ी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Nov 2023

    हम तो गुज़र जाएँगे!

    ‘फ़ैज़’ आते हैं रह-ए-इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम, आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Nov 2023

    कहते रहें मर जाएँगे!

    नेमत-ए-ज़ीस्त का ये क़र्ज़ चुकेगा कैसे, लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Nov 2023

    बाज़ार-ए-सुख़न!

    जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ार-ए-सुख़न, हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर* जाएँगे| *हीरे-मोती फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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