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मैं दुश्मनों में हूँ !
तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ, मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ| अहमद फ़राज़
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हम तो गुज़र जाएँगे!
‘फ़ैज़’ आते हैं रह-ए-इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम, आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कहते रहें मर जाएँगे!
नेमत-ए-ज़ीस्त का ये क़र्ज़ चुकेगा कैसे, लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएँगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बाज़ार-ए-सुख़न!
जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ार-ए-सुख़न, हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर* जाएँगे| *हीरे-मोती फ़ैज़ अहमद फ़ैज़