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तन्हा हो सा जाता हूँ!
मैं तुम से दूर रहता हूँ तो मेरे साथ रहती हो, तुम्हारे पास आता हूँ तो तन्हा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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अपना हो सा जाता हूँ!
मुझे मालूम है मैं सारी दुनिया की अमानत हूँ, मगर वो लम्हा जब मैं सिर्फ़ अपना हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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कलम और कुदाली!
आज एक बार मैं हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी ने साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान किया है| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता…
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तेरा भी इख़्तियार नहीं!
ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया ज़माने ने, कि अब हयात पे तेरा भी इख़्तियार नहीं| साहिर लुधियानवी
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मुझे ख़ुद अपनी !
तुम्हारे अहद-ए-वफ़ा को मैं अहद क्या समझूँ, मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत पे ए‘तिबार नहीं| साहिर लुधियानवी
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ख़ुश-गवार नहीं!
अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब, अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं| साहिर लुधियानवी
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तेरा इंतिज़ार नहीं!
हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं, मैं मुंतज़िर हूँ मगर तेरा इंतिज़ार नहीं| साहिर लुधियानवी
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घटता-बढ़ता देखते हैं!
तुझ को तो हर शाम फ़लक पर घटता-बढ़ता देखते हैं, उस को देख के ईद करेंगे अपना और इस्लाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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तू भी तमाम है चाँद!
अपने दिल के मश्रिक-ओ-मग़रिब उसके रुख़ से मुनव्वर हैं, बे-शक तेरा रूप भी कामिल बे-शक तू भी तमाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा