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दर्द के गीत गा सके!
अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल, कौन तिरी तरह ‘हफ़ीज़’ दर्द के गीत गा सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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हमसे नज़र मिला सके!
शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ, किसकी मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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लब न मगर हिला सके!
रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं, दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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जोश में आ चुके थे हम
होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम, बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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हम न तुम्हें भुला सके!
हम ही में थी न कोई बात याद न तुमको आ सके, तुमने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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चुपचाप उल्लास!
आज एक बार मैं हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की कविताओं में मौन को भी अभिव्यक्त करने का सामर्थ्य है| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी…
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शेर तो उन पर लिक्खे!
शेर तो उन पर लिक्खे लेकिन औरों से मंसूब किए, उनको क्या क्या ग़ुस्सा आया नज़्मों के उनवानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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जब भी उसके पाँव!
और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती, जब भी उसके पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर| जाँ निसार अख़्तर