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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Dec 2023

    दर्द के गीत गा सके!

    अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल, कौन तिरी तरह ‘हफ़ीज़’ दर्द के गीत गा सके|      हफ़ीज़ जालंधरी

  • 10th Dec 2023

    जा के उन्हें सुना सके!

    ऐसा हो कोई नामा-बर बात पे कान धर सके, सुन के यक़ीन कर सके जा के उन्हें सुना सके| हफ़ीज़ जालंधरी

  • 10th Dec 2023

    हमसे नज़र मिला सके!

    शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ, किसकी मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी

  • 10th Dec 2023

    लब न मगर हिला सके!

    रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं, दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी

  • 10th Dec 2023

    जोश में आ चुके थे हम

    होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम, बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके| हफ़ीज़ जालंधरी

  • 10th Dec 2023

    हम न अगर सुना सके!

    तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन, किसकी ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके| हफ़ीज़ जालंधरी

  • 10th Dec 2023

    हम न तुम्हें भुला सके!

    हम ही में थी न कोई बात याद न तुमको आ सके, तुमने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके| हफ़ीज़ जालंधरी

  • 10th Dec 2023

    चुपचाप उल्लास!

    आज एक बार मैं  हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की कविताओं में मौन को भी अभिव्यक्त करने का सामर्थ्य है|   भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी…

  • 9th Dec 2023

    शेर तो उन पर लिक्खे!

    शेर तो उन पर लिक्खे लेकिन औरों से मंसूब किए, उनको क्या क्या ग़ुस्सा आया नज़्मों के उनवानों पर| जाँ निसार अख़्तर 

  • 9th Dec 2023

    जब भी उसके पाँव!

    और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती, जब भी उसके पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर| जाँ निसार अख़्तर 

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