-
धीरे धीरे हारे लोग!
जीवन जीवन हमने जग में खेल यही होते देखा, धीरे धीरे जीती दुनिया धीरे धीरे हारे लोग| जावेद अख़्तर
-
कैसे हैं बेचारे लोग!
दुख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे मारे लोग, जो होता है सह लेते हैं कैसे हैं बेचारे लोग| जावेद अख़्तर
-
ट्रेन की पटरियाँ
आज एक बार मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और वरिष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत – ट्रेन की पटरियाँकह रही है कथाएक आवारगी से जुड़ी…
-
कितना चौड़ा पाट नदी का!
आज एक बार मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और दिनमान पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता – कितना चौड़ा…