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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Dec 2023

    हाथ भी रक्खे कानों पर

    उसका क्या मन-भेद बताऊँ उसका क्या अंदाज़ कहूँ, बात भी मेरी सुनना चाहे हाथ भी रक्खे कानों पर| जाँ निसार अख़्तर 

  • 9th Dec 2023

    पीतल के गुलदानों पर!

    सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया, जाने किस का नाम खुदा था पीतल के गुल-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर 

  • 9th Dec 2023

    मेरे जलते शानों पर!

    शहर के तपते फ़ुटपाथों पर गाँव के मौसम साथ चलें, बूढ़े बरगद हाथ सा रख दें मेरे जलते शानों पर| जाँ निसार अख़्तर 

  • 9th Dec 2023

    फेंक गई है धानों पर!

    बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुर्वाई भी, जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर| जाँ निसार अख़्तर 

  • 9th Dec 2023

    पुराना किला!

    आज एक बार मैं  हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार और धर्मयुग पत्रिका यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक लंबी कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता का रचना काल चीन से युद्ध के बाद का समय है जब नेहरू जी का स्वप्न भंग हो गया था, वे पक्षाघात से पीड़ित थे और राजनीतिज्ञों…

  • 8th Dec 2023

    साड़ी की दूकानों पर!

    आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मिरे रख देती हो, चलते चलते रुक जाता हूँ साड़ी की दूकानों पर| जाँ निसार अख़्तर 

  • 8th Dec 2023

    घर के रौशनदानों पर!

    आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर, उसका काग़ज़ चिपका देना घर के रौशन-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर 

  • 8th Dec 2023

    रुस्वा हो सा जाता हूँ!

    तुझे बाँहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूँ उभरती है, कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर 

  • 8th Dec 2023

    प्यासा हो सा जाता हूँ!

    तिरे गुल-रंग होंटों से दहकती ज़िंदगी पीकर, मैं प्यासा और प्यासा और प्यासा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर 

  • 8th Dec 2023

    झूटा हो सा जाता हूँ!

    मैं चाहे सच ही बोलूँ हर तरह से अपने बारे में, मगर तुम मुस्कुराती हो तो झूटा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर 

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