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आबगीनों से न!
आबगीनों* से न टकरा पाए, कोहसारों** से तो टकराए हैं| *कांच का बर्तन, **पर्वत जाँ निसार अख़्तर
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शायरी तुझ को गँवाया!
क्या पता हो भी सके इस की तलाफ़ी* कि नहीं, शायरी तुझ को गँवाया है बहुत दिन हमने| *क्षतिपूर्ति जाँ निसार अख़्तर
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तुम भी इस दिल को!
तुम भी इस दिल को दुखा लो तो कोई बात नहीं, अपना दिल आप दुखाया है बहुत दिन हमने| जाँ निसार अख़्तर
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जुर्म नज़र आती है!
अब ये नेकी भी हमें जुर्म नज़र आती है, सब के ऐबों को छुपाया है बहुत दिन हमने| जाँ निसार अख़्तर
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तुमने हाँ जिस्म तो!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के मंचों के अत्यंत लोकप्रिय गीतकार रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की लिखी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय त्यागी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की यह ग़ज़ल- तुमने हाँ जिस्म तो आपस में…
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बहुत दिन हमने!
ज़िंदगी तुझ को भुलाया है बहुत दिन हमने, वक़्त ख़्वाबों में गँवाया है बहुत दिन हमने| जाँ निसार अख़्तर
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सवेरे मिरे घर पे आई!
सवेरे सवेरे मिरे घर पे आई, ऐ ‘हसरत’ वो बाद-ए-सबा* महकी महकी| *पुरवाई हसरत जयपुरी
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वो क़ज़ा महकी महकी
ख़ुदा जाने किस किस की ये जान लेगी, वो क़ातिल अदा वो क़ज़ा* महकी महकी| *तक़दीर हसरत जयपुरी