शायरी तुझ को गँवाया!

क्या पता हो भी सके इस की तलाफ़ी* कि नहीं,

शायरी तुझ को गँवाया है बहुत दिन हमने|

*क्षतिपूर्ति

जाँ निसार अख़्तर

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