तुमने हाँ जिस्म तो!

आज एक बार फिर मैं अपने समय के मंचों के अत्यंत लोकप्रिय गीतकार रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की लिखी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|

स्वर्गीय त्यागी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की यह ग़ज़ल-

तुमने हाँ जिस्म तो आपस में बंटे देखे हैं,
क्या दरख्तों के कहीं हाथ कटे देखे हैं|

वो जो आए थे मुहब्बत के पयम्बर बनकर,
मैंने उनके भी गिरेबान फटे देखे हैं|

वो जो दुनिया को बदलने की कसम खाते थे,
मैंने दीवार से वो लोग सटे देखे हैं|

तन पे कपड़ा भी नहीं पेट में रोटी भी नहीं,
फ़िर भी मैदान में कुछ लोग डटे देखे हैं|

जिनको लुटने के सिवा और कोई शौक़ नहीं,
ऐसे इंसान भी कुछ हमने लुटे देखे हैं|

    

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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