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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Sep 2024

    ऐ दोस्त कहीं ये भी!

    अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल,ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th Sep 2024

    शबनम तो नहीं है!

    चाहे वो किसी का हो लहू दामन-ए-गुल पर,सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th Sep 2024

    कुछ ज़ख़्म ही खाएँ!

    कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ,हर-चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th Sep 2024

    सूरज से तिरा रंग!

    गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है,सूरज से तिरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th Sep 2024

    सूनी साँझ!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की एक कविता  शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की यह कविता  –  बहुत दिनों में आज…

  • 6th Sep 2024

    क्या सोच के हम !

    बढ़ती ही चली जाती है तन्हाई हमारी,क्या सोच के हम वादी-ए-इंकार में आए| शहरयार

  • 6th Sep 2024

    ये आग हवस की है!

    ये आग हवस की है झुलस देगी इसे भी,सूरज से कहो साया-ए-दीवार में आए| शहरयार

  • 6th Sep 2024

    देर से बाज़ार में आए!

    उम्मीद से कम चश्म-ए-ख़रीदार में आए,हम लोग ज़रा देर से बाज़ार में आए| शहरयार

  • 6th Sep 2024

    सच मुझे लिखना है!

    ता-कि महफ़ूज़ रहे मेरे क़लम की हुरमत,सच मुझे लिखना है मैं हुस्न को सच लिक्खूंगा| शहरयार

  • 6th Sep 2024

    सोचता रोज़ हूँ मैं!

    शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है,सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा| शहरयार

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