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मगर कल नहीं होते!
ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते, जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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ख़ुदाइयाँ क्या क्या!
हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से, बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सिखाईं तुम ने हमें!
सितम पे ख़ुश कभी लुत्फ़-ओ-करम से रंजीदा, सिखाईं तुम ने हमें कज-अदाइयाँ* क्या क्या| *बेवफाई फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जग-हँसाइयाँ क्या क्या
पहुँच के दर पे तिरे कितने मो‘तबर ठहरे, अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नया कवि!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार तथा अज्ञेय जी द्वारा संपादित प्रमुख काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में भी शामिल कवि स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की यह…
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जुदाइयाँ क्या क्या!
जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें* कितनी, बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या| *Nearness फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम आश्ना थे तो थीं!
न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई, तुम आश्ना थे तो थीं आश्नाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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या वफ़ा नहीं बाक़ी!
अपनी मश्क़-ए-सितम* से हाथ न खींच, मैं नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी| *Cruelity फ़ैज़ अहमद फ़ैज़